राजपूतों के गुण कर्म और स्वभाव

राजपूतों_के_गुण_कर्म_और_स्वभाव

राजपूतो के गुण- कर्म तथा स्वभाव के विषय में वेदों में विवरण मिलता है।

ऋग्वेद

घृत व्रता क्षत्रिय यज्ञ निष्कृतो बृह दिना अध्व राणभार्यायश्रियः ।
अग्नि होता ऋत सापों अदु होसो असृजनु वृत्र तूये ।।
———- ऋग्वेद 10-66-8
अर्थात – नियम पालनकर्ता, क्षत्रिय यज्ञ सम्पादक, महातेजस्वी, यज्ञों के सेवक, प्रतिदिन स्वयं अग्नि में हवन करने वाले, सत्य सेवक, निष्कारण द्रोह रहित ऐसे वीर पुरुष शत्रु-संहारक संग्राम में युद्ध कर्मो को सृजन करते हैं।

ऋतानाना निषेदतु साम्राज्याय सूकतुः ।
घृतत्रता क्षत्रिया क्षत्रमाशतु।।
—– 10-15-8
अर्थात – नियम पालनकर्ता, सत्य के अनुसार चलने वाले क्षत्रिय प्रथम क्षात्र तेज प्राप्त करते हैं और उत्तमकर्म करते हुए साम्राज्य के लिए यत्न करते हैं।

अथर्ववेद में वर्णन आता है

इममिन्द्र वर्धम क्षत्रियेम इमें विशामेक वृष कृष्णुत्वम।
निरामित्रा नक्ष्णुआव सर्वास्तान रध्यारम अहमुत्तरेश ।।
अथर्ववेद 4-22
अर्थात – – हे इन्द्र परमात्मा! इस क्षत्रिय को बढा। तू इसको मेरी भुजाओं में बलिष्ठ कर। इसके शत्रुओं को बलहीन कर दे स्पर्धा के अंदर उन सब शत्रुओं को नष्ट कर।
क्षत्रियों के गुण-कर्म तथा स्वभावों का #मनुस्मृति में वर्णन करते हुए स्वयं मनु जी कहते हैं – –

प्रजानों रक्षा दान मिज्याध्ययन मेथ ॐ।
विषयेत्वन सक्तिश्च क्षत्रियस्त समासतः ।।
अर्थात – – न्याय से प्रजा की रक्षा करना, सबसे प्रजा का पालन करना, विद्या, धर्म की प्रवृति और सुपात्रों की सेवा में धन का व्यय करना, अग्निहोत्री यज्ञ करना व कराना, शास्त्रों का पढना और पढाना, जितेन्द्रिय रहकर शरीर और आत्मा को बलवान बनाना ये क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म है।
श्रीमद्भागवत_गीता में क्षत्रियों के गुणों और कर्मों का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण_अर्जुन को कहते हैं – –

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।।
– – 4-43
अर्थात:- शौर्य, तेज, धैर्य, दक्षता और युद्ध में न भागने का स्वभाव एवं दान तथा ईश्वर भक्ति का भाव ये क्षत्रियों के स्वाभाविक गुण और कर्म है।
देश– धर्म तथा संस्कृति की रक्षा में सर्वस्व त्याग की भावना ही राजपूतों का सबसे बड़ा गुण एवं कर्म रहा है। इसीलिए इस जाति ने मध्यकाल में सैंकड़ों साके और जौहर किये। इसी प्रकार विश्वामित्र जैसे महामुनि, हरिश्चंद्र जैसे सत्यवादी, रघु जैसे पराक्रमी, जनक जैसे राजर्षि, राम जैसे पितृभक्त, कृष्ण जैसे कर्मयोगी, करण जैसे दानी, मोरधवज जैसे त्यागी, अशोक जैसे प्रजा वत्सल, विक्रमादित्य जैसे न्यायकारी, भोज जैसे विद्वान, जयमल जैसे वीर, प्रताप जैसे देशभक्त, दुर्गादास जैसे स्वामिभक्त इसी राजपूत जाति की देन है।

क्रमशः…………..     
भाग – – – 2 शीघ्र ही

Post By:–   राजेन्द्र_सिंह_राठौड़_बालवा 

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