क्षत्राणीयो का बलिदान

क्षत्राणीयो का बलिदान

जय क्षत्राणी। क्षत्रिय शेरो को जन्म देने वाली क्षत्राणीयो का बलिदान भी अमूल्य है, क्षत्राणीयो के बलिदानो यो शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता , फिर भी हमारी और से छोटा सा प्रयास किया गया है।  राजपूतों की वीरता की बातें तो सारी दुनिया करती है। बाप्पा रावल , खुमाण सिंह , हमीर , राणा कुम्भा , राणा सांगा , महाराणा प्रताप, शिवाजी ,चंद्रसेन सिंह राठौर ,पृथ्वीराज चौहान ,गोरा-बादल, जयमल (जयमल सिंह राठोड़)-फत्ता (फतेसिंह चुण्डावत ), कल्लाजी (कल्याण सिंह राठोड़) , वीर दुर्गादास , अमर सिंह राठोड़ , छत्रसाल ,बंदा सिंह राठोड़ (बाँदा बहादुर ) जैसे अनगिनत नाम हैं। जिनकी वीरता और बलिदान को विश्व नमन करता है । पर ऐसे सिंहों को जन्म देने वाली सिंहनियों की महिमा अतुल्य है। महारानी पद्मिनी , रानी कर्मावती , राणी भटियाणी , जीजाबाई, हाड़ी राणी ,पन्नाधाय , दुर्गावती,  झाँसी की रानी आदि के त्याग और बलिदान का स्थान इनसे भी कहीं ऊपर है। धन्य हैं वे राजपूत स्त्रियां जिन्होंने अपना सर काट कर पति को मोह छोड़ रणभूमि में मरने को उद्यत किया । धन्य हैं वो माताए जिन्होंने त्याग और बलिदान के ऐसे संस्कार राजपुत्रों में जन्म से ही सिंचित किए।


चारण कवि वीर रसावतार सूर्यमल्ल मीसण ने “वीर सतसई “में ऐसी ही वीरांगनाओं की कोटि कोटि बलिहारी जाते हुए कहा है।

“हूँ बलिहारी राणियां ,थाल बजाने दीह
बींद जमीं रा जे जणे ,सांकळ हीठा सीह।”

अर्थात :—मैं उन राजपूत माताओं की बलिहारी हूँ जिन्होंने सिंह के समान धरती के स्वामी राजपूत सिंहों को जन्म दिया.

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बेटा दूध उजाळियो ,तू कट पड़ियो जुद्ध।
नीर न आवै मो नयन ,पण थन आवै दूध।

अर्थात:– माँ कहती है बेटे तू मेरे दूध को मत लजाना ,युद्ध में पीठ मत दिखाना ,वीर की तरह मरना तेरे बलिदान पर मेरे आँखोंमें अश्रु नहीं पर हर्ष से मेरे स्तनों में दूध उमड़ेगा 

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गिध्धणि और निःशंक भख ,जम्बुक राह म जाह।
पण धन रो किम पेखही ,नयन बिनठ्ठा नाह ।

अर्थात:–  युद्ध में घायल पति के अंगों को गिद्ध खा रहे हैं ,इस पर वीर पत्नी गिध्धणी से कहती है ,तू और सब अंग खाना पर मेरे पति के चक्षु छोड़ देना ताकि वो मुझे चिता पर चढ़ते देख सकें

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इला न देणी आपणी ,हालरिया हुलराय।
पूत सिखावै पालनैं ,मरण बड़ाई माय।

अर्थात:– बेटे को झूला झुलाते हुए वीर माता कहती है पुत्र अपनी धरती जीते जी किसी को मत देना ,इस प्रकार वह बचपन की लोरी में ही वीरता पूर्वक मरने का महत्त्व पुत्र को समझा देती है। 

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यह पोस्ट हमे ठिकाना साकतली से उर्वशी राठौर बाईसा द्वारा भेजी गई है ।
इस पोस्ट के लिए हम आपके हार्दिक आभारी है ।

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