Maharana Pratap Chalisa

 गं गणपतये नम:

 गं गणपतये नम:

श्रीमद् एकलिंगो विजयते

” क्षत्रात् त्राय ते इति क्षत्रिय:”     

श्री सूर्य गायत्री

भास्कराय विदमाहे महातेजाय धिमही तन्नो सूर्य: प्रचोदयात|

श्री क्षत्रिय वेराट गायत्री

तत्सत् वैराट भुज रूपाय महा सोम्य सर्व विन्घ परिद्देदनाय

महा क्षत्रिय धिमही तन्नो क्षत्रिय: प्रचोदयात्

|| श्री प्रताप चालीसा ||

नमो नम: मेवाड धर, नमोआदि एकलिंग | रगत बहा रातो करयो, उणरा बेटा रंग।।

सदा नमूँ गढ चित्र ने , हल्दी घाटी हमेशा। प्रण  मुँ राणा प्रताप ने , मेदपाट रण देश ।।

 

मेवाड़ पति सुमति महाराणा  । महा मना सब जन ने जाना   ।।१  ।।
हिंदू रक्षक शत्रु सन्हरी  । रास्ट्र-रक्षा महा व्रत धारी       ।।२  ।।
शूरवीर था वह प्रतापी      ।  सज्जन योद्धा अरि-संतोषी   ।।3  ।।
धर्म हेतु चमका वह ऐसा    । समर भूमि मे अर्जुन जेसा  ।।4  ।।
हिंदू पन मे था वह पुरा        । धृति धर्म धर उत्तम शूरा   ।।5  ।।
नस-नस मे हिन्दू -हित धारे   । करता था सु-कर्म भी सारे   ।।6  ।।
संकट मे जीवन को डारे         । वन वन बल सम्भारे        ।।7  ।।
उसने पक्का प्रण दिखलाया   । विपद घोर मे न घबराया    ।।8  ।।
वन जंगल में फिर ता जाता    । गिरी कन्दर में सैन्य छिपा   ।।9  ।।
सिंह आदि हिंसक भय देने     ।  फिरते प्राण जहां हर लेने  ।।10  ।।
सर्प विषैले जहां ही होते       ।    अभय वहां है राणा सोते  ।।11  ।।
मुगल शक्ति सारी कम्पाई    ।  दहेली दल कि रिढ झुकाई   ।।12  ।।
हटा नहीं रहती और राई       ।   पुरे कुल कि रित निभाई  ।।13  ।।
मंगल ग्रह मुगल का भारा     ।   अकबर नाम कही ना हारा  ।।14  ।।
ऐसि उसने रित चलाई        ।     रजवाड़े लड़की दे स्याही  ।।15  ।।
बहूतो ने भय से यह माना     ।    पर अधर्म राणा ने जाना  ।।16  ।।
नकार किया शक्ति को धारे       ।   चकित हुए तब राजा सारे   ।।17  ।।
कूटनीति राणा ने जानी              ।   अकबर की कोई बात न मानी  ।।18  ।।
प्राण जाय पर आन न जाय        ।     जोखो मे पड़ धर्म बचाय   ।।19  ।।
अकबर ने ले दल बल भारा    ।     राणा पर जा छापा मारा  ।।20  ।।
हट हो लोटा दम्पत्ति लोभी    ।     जीत सका उसे नहीं सो भी  ।।21  ।।
बार-बार चढ़ आया हठीला     ।     हूआ क्रोध में काला पिला  ।।22  ।।
सेना सव्र सु सज्जित ही ला    ।     मेरा उसने बन-बन टीला       ।।23  ।।
पर प्रताप को न भरा पाया     ।     बल एंडी तक सव्र लगाया  ।।24  ।।
अपने जन सब बने कराते     ।     राणा पास भिल मिल आया  ।।25  ।।
राणा ने वे सभी बजाते        ।     रण दीक्षा दे वीर बनाये  ।।26  ।।
उनको लेकर दल सहारे       ।      अकबर के योद्धा बहू मारे       ।।27  ।।
निडर हठिले शुर कराते       ।     हिन्दू पन के थे रखवारे  ।।28  ।।
मुगल दलों पर धावा बोले     ।     करते उन्हें बाण से पोले       ।।29  ।।
कोष समाप्त हुआ ही पाया    ।     दृष्टिगत जन दु:ख भी आया  ।।30  ।।
भामा शाह राम अनूरागि            ।     रामभक्त धनिक बड भागि  ।।31  ।।
हाथ जोड़ राणा से बोला       ।     भेंट सहित धन मेरा चोला   ।।33  ।।
चरणों पर है अपि्त माया     ।     जाति धर्म हित हि मम काया  ।।33  ।।
कर गृहण स्वदेश बचाओ      ।     नारि नर के कष्ट मिटाओ  ।।34  ।।
राणा ने ले धन बहू सारा       ।     सेना सजा शत्रु-दल मारा  ।।35  ।।
देश सेवक जाति हितकारी     ।          हुआ प्रताप सुशक्ति धारि  ।।36  ।।
रिती- निती से निपुण कमाया  ।     मर्यादा को खुब निभाया   ।।37  ।।
आखिर में भाई-भाई मिलाया   ।     आंसु पंत होई देश गुण गाया   ।।38  ।।
राम भजन के धाम पधारा          ।     जो है सब भक्तो का सहारा   ।।39  ।।
अमर काज निज नाम बनाया  ।     हिन्दू छत्रपति सबने गाया   ।।40  ।।

 जो दृढ राखे धर्म को, तिहिं राखे करतार ।

या कुल को वचन हे जाणत सब संसार।।

ये चालीस स्व. ठा. सा. महेंद्र सिंह चुन्डावत द्वारा रचित हे,

 ठि. कचनारा , जिला मन्दसौर

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