शूरवीर राजा हम्मीर देव चौहान की गौरव गाथा | History of Raja Hammir Dev Chauhan

शूरवीर अजेय योद्धा राणा हम्मीर देव जी चौहान, ऐसा राजपूत योद्धा जिसके बारे में जानकर आपकी रूह भी कांप उठेगी

राणा हम्मीर देव जी चौहान, पृथ्वीराज चौहान के बाद चौहान वंश के सबसे प्रतापी राजा माने जाते हैं । इन्होंने अपने शासनकाल में चौहान वंश और रणथम्भौर के राज्य का गौरव चरम सीमा पर पहुंचा दिया था । तराइन के दुसरे युद्ध में छल-कपट की नीति से मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को हरा दिया । इसके बाद मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज के बेटे गोविन्दराज को अजमेर का शासक तो बना दिया लेकिन अजमेर की गद्दी उसे इस शर्त पर मिली थी कि वह दिल्ली के अधीन रहेगा । गोविन्दराज ने इस शर्त को स्वीकार कर लिया, इस वजह से सभी चौहान सिरदार नाराज हो गए और उन्होंने एक रात को गोविन्दराज के चाचा के नेतृत्व में उस पर धावा बोल दिया । गोविन्दराज की सुरक्षा हेतु नियुक्त हजारों मुसलमान मौत के घाट उतार दिए गए। विवश होकर गोविन्दराज रणथम्भौर भाग आया और आया आकर उसने अपनी सैनिक शक्ति बढ़ाई । इसके साक्ष्य में हम मंगलाना का शिलालेख देख सकते हैं, इससे स्पष्ट है कि रणथम्भौर में चौहान राज्य की स्थापना करने वाला पृथ्वीराज चौहान का पुत्र गोविन्दराज था, और हम्मीर देव चौहान उसी का वंशज था। हम्मीर देव चौहान के पिता जैत्रसिंह चौहान थे ‌। सर्वप्रथम 1290 ई. में जलालुद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर पर आक्रमण किया, जलालुद्दीन खिलजी की सेना, चौहानों की सेना से काफी बड़ी थी, फिर भी वीर हम्मीरदेव चौहान ने अपनी वीरता से तुर्क सेना को खदेड़ दिया । फिर कुछ समय बाद सन् 1299 ई. में जलालुद्दीन खिलजी के भतीजे और दामाद, अलाउद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर पर आक्रमण करने के लिए बयाना के गवर्नर उलुगखां और सेनापति नुसरत खां को सैनिक दस्तों के साथ रणथम्भौर आक्रमण के लिए भेजा । हम्मीरदेव चौहान ने इस सेना से लड़ने के लिए अपने दो सेनापति भीमसिंह और धर्मसिंह को भेजा । इस युद्ध में राजपूतों की सूझबूझ के कारण तुर्क सेना की पराजय हुई और राजपूतों ने तुर्को को रणथम्भौर से बहुत दूर तक खदेड़ दिया । इस युद्ध में भीमसिंह मारे गए, भीमसिंह कि मौत के पीछे धर्मसिंह का षड्यंत्र बताया जाता है । इस युद्ध में तुर्कों के हार जाने के कारण अलाउद्दीन खिलजी बहुत क्रोधित हुआ, उसने अपने सेनापति उलुगखां को 1,00,000(एक लाख) घुड़सवारों सहित रणथम्भौर चौहान राज्य पर वापस हमले के लिए भेजा । हिन्दूवाट दर्रे के पास पहुंचने पर राणा हम्मीर देव चौहान और तुर्की खिलजी सेना के बीच युद्ध हुआ और इस युद्ध में भी राणा हम्मीर देव चौहान ने खिलजी सेना को हरा दिया और राजपूतों ने हजारों मुसलमान को मौत के घाट उतार दिया । इस घटनाक्रम की जानकारी अलाउद्दीन खिलजी को मिली तब वह बहुत नाराज़ हुआ और उसके क्रोध की सीमा नहीं रही । सन् 1300 ई. में अलाउद्दीन ने वापस रणथम्भौर पर आक्रमण के लिए अपने प्रसिद्ध सेनापति उलुगखां और नुसरत खां को वापस आदेश दिया । खिलजी सेनापतियों के नेतृत्व में बहुत से स्थानों को लुटा गया और राणा हम्मीर देव के पास सूचना अथवा प्रस्ताव भिजवाया गया कि अगर वह आत्मसमर्पण कर देगा तो सेना वापस लौट जाएगी । राणा हम्मीर देव जैसे शूरवीर योद्धा और स्वाभिमानी राजपूत के लिए आत्मसमर्पण बहुत ही शर्मनाक बात थी । इसलिए राणा हम्मीरदेव चौहान ने इस प्रस्ताव को घृणापूर्वक ठुकरा दिया । हम्मीरदेव चौहान ने जब आत्मसमर्पण नहीं किया तब रणथम्भौर पर तुर्क सेना का भीषण आक्रमण हुआ। रणथम्भौर के दुर्ग का घेरा डालते हुए सेनापति नुसरत खां की मृत्यु हो गई, इस स्थिति का फायदा उठाते हुए चौहानों ने किले से एकाएक निकलते हुए घेरा डाले हुए मुस्लिम सैनिकों पर भीषण आक्रमण किया। इस अचानक आक्रमण को तुर्क सेना सहन नहीं कर सकी और चौहानों ने वापस तुर्को को हराकर दूर तक खदेड़ दिया । तुर्क सेना की पराजय का समाचार सुनकर अलाउद्दीन खिलजी ने सेना की बागडोर अपने हाथ में ले ली, और अलाउद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर का घेरा डाल दिया ‌। अलाउद्दीन खिलजी ने एक साल तक रणथम्भौर के किले का घेरा डाले रखा, इससे मुस्लिम सैनिकों को बहुत से कष्टों का सामना करना पड़ रहा था, इस वजह से अलाउद्दीन खिलजी को युद्ध में जीतने और सफलता की कोई आशा नजर नहीं आई। तब अलाउद्दीन खिलजी ने छल-कपट की नीति से चौहानों को हराने का निश्चय किया । अलाउद्दीन खिलजी ने कूटनीतिक चाल चलते हुए उसने राणा हम्मीर देव चौहान को संदेश भिजवाया कि वह अपने सेनापति रतिथला को सन्धि-वार्ता के लिए शाही शिविर में भेज दें । फिर अलाउद्दीन खिलजी ने सेनापति रतिथला को रणथम्भौर दुर्ग देने का आश्वासन देकर अपने पक्ष में कर लिया, और हम्मीरदेव चौहान के एक अन्य सेनापति रणमल को भी अलाउद्दीन खिलजी ने अपने पक्ष में कर लिया । इन दोनों सेनापतियों के विश्वासघात के बाद भी अलाउद्दीन खिलजी दुर्ग पर अधिकार नहीं कर पाया ‌‌। इसी बीच रणथम्भौर दुर्ग में खाद्य-सामग्री का भयंकर अभाव हो गया, ऐसी स्थिति में हम्मीरदेव चौहान ने अधिक दिनों तक किले में बंद रहना उचित नहीं समझा । राणा हम्मीरदेव चौहान ने केसरिया करने का निर्णय लिया, शत्रु पर अंतिम आक्रमण के लिए जाने से पहले राजपूत स्त्रियों के लिए जौहर की व्यवस्था की गई । राणा हम्मीर देव चौहान जी की रानी रंगदेवी के नेतृत्व में हजारों राजपूत रानियों और अन्य स्त्रियों ने जौहर की चिता में प्रवेश किया । इसके बाद राजपूत सैनिकों ने राणा हम्मीर देव के नेतृत्व में केसरिया वस्त्र धारण किए और दुर्ग का फाटक खोलकर शत्रुओं से अन्तिम युद्ध करने निकल पड़े । मुस्लिम और राजपूत सेनाओं में भयंकर युद्ध हुआ, राजपूतों ने आधे से ज्यादा मुस्लिम सेना को मौत के घाट उतार दिया । लेकिन राजपूत मुस्लिम सैनिकों के सामने अल्पसंख्यक थे, जिस कारण वह ज्यादा समय तक युद्ध नहीं कर पाये और लगभग सभी राजपूत वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन वीर भी राजपूतों ने आधे से भी खिलजी सेना को मौत के घाट उतार दिया था । राणा हम्मीर देव चौहान वीरतापूर्वक लड़े लेकिन जब युद्ध में राणा हम्मीर देव को कोई सफलता की कोई आशा नहीं रही तब राणा हम्मीर देव ने अपने ही हाथ से अपना शीश काटकर भगवान शंकर को अर्पित कर दिया, इसके साक्ष्य में हम “हम्मीर महाकाव्य” ले सकते हैं । तो इस प्रकार राणा हम्मीर देव चौहान ने अपना स्वाभिमान और आन-बान-शान को अपने अंतिम समय तक बरकरार रखा । राणा हम्मीर देव चौहान अपने समय के सबसे प्रतापी और शूरवीर योद्धा थे, अगर अलाउद्दीन खिलजी छल-कपट की नीति ना अपनाता, तो राणा हम्मीर देव चौहान को युद्ध में हराना नामुमकिन था । इतिहास इस बात का गवाह है कि राजपूतों को हमेशा छल-कपट की नीति से हराया गया है, क्योंकि युद्ध में राजपूतों को हरा पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है । राणा हम्मीर देव की मृत्यु के बाद उसके विश्वासघाती सेनापति रतिथला और रणमल को अलाउद्दीन के सामने पेश किया गया, अलाउद्दीन खिलजी ने अपना वचन निभाने की जगह उन्हें मौत की सजा दी । अलाउद्दीन खिलजी का कहना था कि जो अपने स्वधर्मी राजा के प्रति निष्ठावान नहीं रह सका, उससे भविष्य में स्वामिभक्ति की आशा कैसे की जा सकती है ।

राणा हम्मीर देव जी चौहान द्वारा अपने जीवनकाल की प्रमुख विजयों में शामिल है :-

1). भीमसर शासक अर्जुन पर विजय
2). मांडलगढ़ उदयपुर पर विजय
3). चितौड़गढ़ सहित प्रताप गढ़ पर विजय
4). मालवा प्रदेश पर विजय
5).आबू सिरोही के शासकों पर विजय
6). काठियावाड़ के साम्राज्य पर विजय
7).पुष्कर राज अजमेर पर विजय एवं पुष्कर झील में शाही स्नान करना
8). चम्पानगरी एवं त्रिभुवनगरी पर विजय
9). ग्वालियर श्योपुर साम्राज्य पर विजय
10). टोंक डिग्गी के नवाबो पर विजय
11). विराटनगर जयपुर एवं मत्स्य प्रदेश पर विजय
12). जलालुद्दीन खिलजी पर तीन बार विजय
13). उलगुखां, अल्पखां एवं नुसरत खां पर विजय
14). उज्जैन साम्राज्य पर विजय एवं महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का पुनर्निर्माण करवाकर क्षिप्रा नदी में महाकालेश्वर की पूजा करना.
15). मथुरा प्रदेश एवं जाट साम्राज्य पर विजय
16). झाइन और बूँदी तारागढ़ सहित सम्पूर्ण हाडौती क्षेत्र पर विजय

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