तंवरावाटी (तोरांवटी) तथा पाटन राज्य के तंवर (तोमर) राजपूतों का इतिहास

तंवरावाटी (तोरांवटी) तथा पाटन राज्य के तंवर (तोमर) राजपूतों का इतिहास

जयपुर और सीकर के आस-पास का क्षेत्र, जिसे आजकल तोंरावाटी अथवा तंवरावाटी के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र की राजधानी पाटन रही है। तोंरावाटी, संस्कृत के ‘तोमर’ शब्द से उत्पन्न ‘तँवर’ या ‘तुंवर’ राजपूतों के आधिपत्य के कारण ‘तोंरावाटी’ पड़ा हैं। इस क्षेत्र पर तोमरवंशी राजपूतों का शासन रहा हैं इसलिए इसे तोमरवाटी’ कहा जाने लगा, जो लोकभाषा में तोरावाटी अथवा अब तंवरावाटी कहलाने लगा हैं। राजस्थान में ऐसे अनेक क्षेत्र है जिनके नाम आज भी उस क्षेत्र पर शासन करने वाली जाति विशेष के नाम से जाने जाते है जैसे मांगलियावाटी जहां गुहिलोत मांगलियों का निवास क्षेत्र रहा है, बीकानेर की स्थापना से पूर्व उसके आस-पास का क्षेत्र जोहियावाटी कहलाता था जो जोहिया राजपूतो के कारण पड़ा, इसी प्रकार राव शेखाजी के वंशजो को शेखावत कहते है और उनका ठिकाना आज भी शेखावाटी कहा जाता है। इसी कड़ी में तोमरवंशी राजपूतों का ठिकाना ‘तोंरावाटी’ के नाम से विख्यात हैं।

तंवरावाटी और पाटन के तंवर राजपूतों का सीधा-संबंध पांडू पुत्र अर्जुन के वंशज दिल्लीपति सम्राट अनंगपाल तोमर से है। अनंगपाल द्वितीय ने अपने दो पुत्र अमजी और सलूण (शलिवाहन) को जयपुर के आस-पास के इस वर्तमान तोंरावाटी क्षेत्र में स्थापित किया था। इनसे पूर्व भी दिल्ली के तोमर राज्य की सीमाएं इस क्षेत्र तक फैली हुई थी। कालान्तर में इस क्षेत्र तक दिल्ली की सीमाएं सुरक्षित करने के उद्देश्य से इन दोनों राजकुमारों को इस क्षेत्र में स्थापित किया गया था। सलून ने 1088 ई. में अचलगढ़ के किले को फतह किया था। इसके पश्चात् उन्होंने नारनौल गांव से लेकर नीमकाथाना और कोटपूतली तक सांखला राजपूतों के 32 गांवों पर अधिकार किया था, यह 32 गांव पहले सांखला पंवार राजपूतों के अधिकार में थे और सांखला राजपूत बेवा को अपनी राजधानी बनाकर रह रहे थे, परंतु महाराज अनंगपाल तोमर के बहादुर पुत्रों ने ‘बेवा’ के सांखलों से युद्ध करके उन्हें पराजित कर बेवा पर अधिकार कर लिया। सलूण के बड़े भाई अमजी ने थोड़ा आगे बढ़कर नरेणा पर अधिकार कर लिया और कालान्तर में अमजी के वंशज अजमालजी हुए। जिनके वीर पुरुष रामदेवजी हुए जिन्होंने रामदेवरा में अपनी राजधानी स्थापित की।

सलून(शालिवाहन) तोमर ने अपने बाहुबल से आस-पास के बड़े भू-भाग पर अधिकार कर एक सुदृढ़ राज्य की स्थापना करना प्रारम्भ किया। सलून जी के निहालसिंह पुत्र हुए। जिन्होंने पाटन के नजदीक नरहर को 1109 ई. में जीता था । इसके बाद 1110 ई. में निहालसिंह के पुत्र राजा दोहथा ने पाटन के पास ही तोंदा को जीत कर अचलगढ़ की सीमा में मिला लिया था। राजा दोहथा के तीन पुत्र हुए- हरमन, जैरथ और पोपट ।

राजा दोहथा के द्वितीय पुत्र जैरथ बड़े वीर पुरुष हुए, उनके शरीर पर घने (अत्यधिक) बाल होने के कारण उन्हें जटमल कहा जाने लगा। कालानन्तर में इन्हीं जटमल के वंशजों को जाटू तोमर कहा जाने लगा। इनके वंशज हरियाणा के रोहतक, भिवानी, सिरसा, महेन्द्रगढ़, गुड़गांव आदि के 1440 गांवों में बसते हैं।

इनके बड़े भाई हमरनजी ने पिता से आज्ञा प्राप्त कर धौलपुर व उसके आस-पास के क्षेत्र पर अधिकार करने हेतु चले गये। राजा दोहथा तोमर के देहान्त के पश्चात् तृतीय पुत्र पोपटराज जी तोमर उनके उत्तराधिकारी बने। राजा पोपटराज तोमर वीर व साहसी राजा हुए इन्होंने अपने राज्य को सुरक्षित करने हेतु सन् 1135 ई. में ‘पपरूना’ नामक गांव की नींव रखी। राजा पोपटराज की मृत्यु के पश्चात उनके उत्तराधिकारी राजा पीपलराज तोमर ने 1156 ई. में पाटन के बाहू सांखला को युद्ध में पराजित कर पाटन को जीत लिया था। उसके पश्चात् ‘बिहार’ के भीम सांखला को युद्ध में पराजित कर उससे बिहार छीन लिया था। आस-पास के सभी क्षेत्रों को मिलाकर राजा पीपलराज ने पाटन को तोमर राज्य की राजधानी का गौरव प्रदान किया।

राजा पीपलराज के समकालीन दिल्ली में शक्तिशाली तोमर शासक मदनपाल राज्य कर रहे थे। मदनपाल उस समय उत्तरी भारत के एक शक्तिशाली राजा थे। पाटन के तोमर दिल्ली के तोमरों की ही शाखा थी। राजा पीपलराज के चार पुत्र हुए – आसल जी (अलसी) कोनसी जी, पालन जी और भैरूजी । राजा पीपलराज की मृत्यु के पश्चात् आसल जी पाटन की राजगद्दी पर बैठे |

आसलजी तोमर ने राजगद्दी पर बैठते ही अपनी शक्ति और राज्य का विस्तार करना आरंभ कर दिया और इन्होंने राणा का विरूद धारण किया जो बड़ी उपलब्धि का द्योतक हैं। राणा आसलजी तोमर के समकालीन अजमेर के पृथ्वीराज चौहान थे। पाटन के राणा आसलजी तोमर ने तुर्कों के विरुद्ध दिल्ली के राजाओं का साथ दिया था और तराईन की दोनों युद्धों में राणा आसल और पाटन के तोमरों ने भाग लिया था।राणा आसल के बाद क्रमश: कंवरसी (कमल), महीपाल, भूपाल, बच्छराज, बहादड़ और बहादुरसिंह तोमर पाटन के राणा हुए।

राणा बहादुरसिंह की चौदह रानियों से 32 पुत्र हुए। इन बत्तीस पुत्रों को आजीविका हेतु बत्तीस गांव दिए गए जिससे यह क्षेत्र बत्तीसी के नाम से पहचाना जाने लगा। राणा बहादुरसिंह के पश्चात् क्रमश: पिरथीराज (पृथ्वीराज) राणा कल्याण, कुम्भा, भेरसी (बहरसी) और राणा जगमाल पाटन की गद्दी पर बैठे । राणा जगमाल के 8 पुत्र हुए। जिनमें बड़े पुत्र पूर्णमल राणा बने, उनके पश्चात् लाखन और लूणकर्ण हुए। राणा लूणकर्ण के 11 पुत्रों में से 8 पुत्र जीवित रहे, जिनसे तंवर राजपूतों के ‘आठ थांबे’ प्रारम्भ हुए। राणा लूणकर्ण के पश्चात् उनके पुत्र राणा कंवल जी तोमर पाटन की गद्दी पर बैठे।

राणा कंवल के दो रानियां थी, जिनसे 11 पुत्र हुए जिनमें से चार पुत्र ही जीवित रहे, बाकी पुत्रों ने तुर्क आक्रांताओं के खिलाफ युद्ध में वीरगति प्राप्त की। राणा कंवल के एक पुत्री भी थी जिसका विवाह आमेर के शासक उदयकरण जी (1366-1388 ई.) के साथ किया गया था। राणा कंवल के चारों पुत्र उदो जी, आसल जी, केलोर जी और फत्तु जी के नाम से अलग-अलग चार खांपें फटी जो उनके नाम पर कहलाई। बड़ी रानी से उदो जी का जन्म हुआ और बाकी तीनो का छोटी रानी से हुआ था। उदोजी की माता का देहान्त हो जाने के पश्चात् उनकी जामाता ने अपने पुत्र आसल को राजगद्दी पर बिठाने के लिए षडयन्त्र करने प्रारम्भ कर दिये। उसने उदोजी को जहर देने का भी विफल प्रयास किया। जब उदोजी को इसका ज्ञान हुआ तब उन्होंने अपने सौतेले भाई के पक्ष में पाटन का राज्य हमेशा के लिए छोड़ कर अन्यत्र चले गये। उदोजी ने नीमकाथाना के कई गांवों को अपने अधिकार में करके राज्य करना प्रारम्भ किया इनके वंशज उदा के तंवर (तोमर) कहलाते हैं। इनके दूसरे भाई केलोर जी के वंशज केलोरजी के तंवर कहलाते हैं। उदा के तंवर आज भी पाटन के महलों में प्रवेश नहीं करते हैं।

राणा कंवल के पश्चात् उनके पुत्र आसल जी गद्दी पर बैठे, इनके वंशज आसलजी के तंवर अथवा आसो के तंवर कहलाते हैं। राणा आसलजी के समय पाटन दिल्ली के सुल्तानों के अधीन हो गया था। जिस प्रकार अन्य राज्य दिल्ली के सुल्तानों को कर देते थे, उसी प्रकार पाटन को भी कर देना पड़ा था। इसी समय पाटन के शासको को राणा के स्थान पर राव कहा जाने लगा।

आसलजी के पांच पुत्र हुए। राव आसल के बाद खीबूजी पाटन के ‘राव’ बने। खीबूजी के बाद सहसमलजी तथा कपूरोजी पाटन के राव बने। कपूरोजी के दो पुत्र थे- बीकोजी व अखैजी। कपूरोजी के बाद उनके बड़े पुत्र बीकोजी पाटन के राव बने। कपूरोजी के छोटे पुत्र अखैजी के परसरामजी पुत्र थे, इन्हीं परसरामजी के वंशज परसरामजी के तंवर कहलाते हैं। पाटन के राव बीकोजी का समयकाल विक्रम संवत 1562 के आसपास का था, यह अपने समय में पाटन के स्वतंत्र राव थे। राव बीकोजी के पश्चात छोटा आसल और उनके पश्चात राव बलभद्रसिंह तंवर पाटन के राव बने।

राव बलभद्रसिंह ने 1564 ई. में आगरा के लाल किले कि नकल पर पाटन में किला बनवाया था। आगरा के किले का जीर्णोद्धार राजपूत राजा बादलसिंह ने करवाया था और वह बादलगढ़ के नाम से जाना जाता था जो दिल्ली के तोमर शासको के अधीन लम्बे समय तक रहा । जब अकबर ने इस किले में अनेक सुधार करवा कर पुनः निर्मित करवाया उसी दौरान राव बलभद्रसिंह ने भी पाटन में आगरे के इस किले की नकल का किला बनवाया था।

राजपूताने की विभिन्न रियासतों के साथ अकबर के संधि कर लेने के पश्चात् लगभग पूरा राजपूताना मुगलों की मनसबदारी में आ गया था। जो बड़े-बड़े राजा थे, उन्हें बड़ा मनसब और छोटे जागीरदारों को छोटा या उनकी बहादुरी के अनुसार मनसब देकर मुगल राज दरबार में आरूढ़ कर दिया गया। जयुपर के राजाओं के साथ आस-पास के छोटे मोटे राजाओं ने भी सीधे मुगलों की अधीनता को स्वीकार किया, इसी कड़ी में पाटन के तोमरों ने भी मुगल सत्ता को स्वीकार कर सहयोग करना प्रारम्भ कर दिया। ऐसा उल्लेख मिलता है कि राव बलभद्रसिंह के समय कोटपूतली को मुगल सूबे में मिलाकर वहां टकसाल बनाई गई थी, बादशाह ने इस टकसाल की देख-रेख का जिम्मा राव बलभद्रसिंह को सौंपा था।

1601 ई. में मुंगेर की लड़ाई के दौरान बादशाह ने राव बलभद्रसिंह को भेजा था। दुर्ग बहुत ही सुदृढ़ था जिसे जितना मुश्किल हो रहा था। उसी दौरान बादशाह ने राव बलभद्रसिंह को मुंगेर फतह करने की जिम्मेदारी सौंपी। जब दुर्ग पर चढ़ने का कोई सफल प्रयास नहीं हो सका तो राव बलभद्रसिंह ने अपने साथियों के साथ सिर पर केशरिया साफे बांधकर दुर्ग के द्वार को तोड़ दिया और वही पर ही वह वीरगति को प्राप्त हुए। इनके वीरगति पाने के पश्चात् इनकी रानी इनके साथ सती हुई, जिनकी स्मृति में बनी मुंगेर में छत्री आज भी मौजूद है। मुंगेर का दुर्ग फतह कर लिया गया परन्तु बादशाह अकबर ने राव बलभद्रसिंह के वीरगति पाने पर दुख प्रकट किया और उनके पुत्र दलपतसिंह को ‘राव’ का खिताब और खिलहत देकर पाटन भेजा।

राव बलभद्रसिंह वीर होने के साथ जीणमाता के परमभक्त थे। उनके वीरगति पाते समय युद्ध क्षेत्र में ही जीणमाता ने उन्हें दर्शन देकर कहा कि ‘पाटन जाये बिना मेरी यात्रा पूरी नहीं मानी जायेगी।’ तब से जीणमाता के मन्दिर के पट खुलते समय सर्वप्रथम पाटन के दर्शनार्थी को दर्शन कराया जाता है।

राव बलभद्रसिंह के पश्चात् क्रमश राव दलपतसिंह, राव प्रतापसिंह और राव केसरीसिंह हुए। राव केसरीसिंह को सिंहराज भी कहा जाता है। राव केसरीसिंह का शासन काल शान्ति का काल था। उन्होंने पाटन में बादलगढ महल बनाया तथा महलों के मध्य एक सरोवर भी बनवाया। इनके समय पाटन में स्थापत्य और कला का विकास हुआ था।

राव केसरीसिंह के पश्चात् क्रमशः फतेसिंह, जसवंतसिंह और घासीरामजी तंवर पाटन के राव बने। 1699 ई. में राव घासीरामजी तंवर की मृत्यु के पश्चात् पाटन के महाराव बकसीरामजी तंवर बने । राव बकसीराम की दो पुत्रियां का उल्लेख मिलता है, जो जोधपुर महाराजा अजीतसिंह और महाराजा अभयसिंह को ब्याही गई थी तथा इनके दो पुत्र समरथसिंह और रणजीसिंह भी थे। रणजीसिंह ने खेतड़ी के सिहोर में अपना शासन स्थापित किया था। राव बकसीराम के उत्तराधिकारी राव समरथसिंह हुए। राव समरथसिंह को धीरजसिंह भी कहा जाता था, राव समरथसिंह के पश्चात् पाटन के राव सम्पतसिंह हुए।

राव सम्पतसिंह के समय की दो महत्वपूर्ण घटनाएं मिलती है। उनके समय में राजपूताने के शासकों ओर मराठों के मध्य तुंगा का युद्ध लड़ा गया था, इसके अलावा 1767 ई. में जयपुर के महाराजा माधवसिंह की सेना और भरतपुर के जाट राजा जवाहरसिंह के मध्य तोरावाटी के मावण्डा में भयंकर युद्ध लड़ा गया था, जिसमें तोरावाटी के तोमरों ने जयपुर राज्य का साथ देते हुए भरतपुर की सेना के खिलाफ वीरता और शौर्य दिखाया था ।

राव सम्पतसिंह के समय की दूसरी महत्वपूर्ण लड़ाई पाटन का युद्ध था, जो राजपूताने के जोधपुर, जयपुर और अन्य राजपूत राजाओ और मराठा महादजी सिंधिया के मध्य लड़ा गया था। इस युद्ध में पाटन के तंवरों ने भी भाग लिया था तथा युद्ध में भाग लेने वाले राजपूतों को शरण देने के कारण मराठाओं ने पाटन के दुर्ग को घेर लिया और पाटन के राव सम्पतसिंह को कड़े संघर्ष के पश्चात् संधि करनी पड़ी थी। इस संधि के पश्चात पाटन जो अजेय दुर्ग था, उसे मराठाओं के सामने अधीनता स्वीकार करनी पड़ी थी। इस युद्ध के पश्चात् पाटन की आर्थिक स्थिति पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा था। राव सम्पतसिंह के पश्चात् राव जवाहरसिंह पाटन की गद्दी पर बैठे।

राव जवाहरसिंह के समय मराठों ने कोटपूतली जो तोंरावाटी का सूबा था उसको अलवर के राव बख्तावरसिंह को बेच दिया तथा पाटन के रावो का राज्य मराठाओं के कारण टूटने बिखरने लगा। राव जवाहरसिंह समय पाटन में कला और साहित्य का अच्छा विकास हुआ था।

जयपुर के महाराजा जगतसिंह से शेखावाटी और अन्य ठिकानेदारों की नाराजगी के कारण अमीरखां ने इस क्षेत्र में खूब आतंक फैलाया तथा 1818 की अंग्रेजों के साथ हुई संधि के समय जयपुर महाराजा ने अपने प्रभाव से पाटन के इलाके को जयपुर की सीमा में मानते हुए अंग्रेजो से पाटन सहित जयपुर की संधि कर ली, जिससे तोंरावाटी अथवा तंवरावाटी और पाटन जयपुर के अधीन माना जाने लगा। उस समय पाटन के राव ने उस संधि को मानने से इन्कार कर दिया था परन्तु राव जवाहरसिंह के पुत्र लक्ष्मणसिंह ने राजसत्ता के लालच में आकर राव जवाहरसिंह की हत्या कर दी और अपने छोटे भाई बिशनसिंह को कैद कर लिया। इस घटना के पश्चात् जयपुर के महाराजा ने मौके का फायदा उठाकर हस्तक्षेप किया और किशनसिंह के नेतृत्व में जयपुर की सेना को भेजकर राव लक्ष्मणसिंह से जुर्माना वसूल किया।

राव लक्ष्मणसिंह के समय 1835 ई. में पाटन जयपुर के मार्फत अंग्रेजों का करद राज्य बन गया तथा 1837 ई. में पाटन को जयपुर के अधीन कर दिया गया। राव लक्ष्मणसिंह के समय पाटन में अव्यवस्था तो बनी रही परन्तु लक्ष्मणसिंह ने अनेक निर्माण कार्य भी करवाए, पाटन पर्वत पर गोपाल भगवान का मन्दिर भी बनवाया।

राव लक्ष्मणसिंह के पश्चात् क्रमशः राव किशनसिंह, राव मुकन्दसिंह, राव उदयसिंह और राव वीर विक्रमसिंह पाटन की गद्दी बैठे। पाटन के वर्तमान राव दिग्विजयसिंह जी तंवर है।

पाटन के तोमरों ने अंग्रेजों से संधि होने से पूर्व तक अपनी स्वतन्त्रता को बनाए रखा तथा समय-समय पर अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा भी करते रहे। तोंरावाटी क्षेत्र में तोमरो के पाटन के अलावा छोटे मोटे सौ से अधिक ठिकाने बन्धे तथा वहां के तोमरों ने प्रत्येक क्षेत्र में भारतीय इतिहास को प्रभावित करने का भरपूर प्रयास किया। कला साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में तोरांवटी के तोमरों ने प्राचीन परम्परा का निर्वाह करते हुए अपनी एक विशिष्ट पहचान स्थापित की तथा देश की स्वतन्त्रता के पूर्व और पश्चात् भी इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

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