बीदासर ठिकाने का इतिहास

बीदासर ठिकाने का इतिहास

बीदासर ठिकाने के सिरदार दोहरी (दौलड़ी) ताजीम और हाथ के कुरब का सम्मानवाले ठिकानेदार हैं। राव जोधा के एक पुत्र बीदाजी थे, राव बीदाजी राव बीकाजी के सहोदर भाई थे और साथ ही राव बीदाजी छापर-द्रोणपुर के स्वामी थे।

राव बीदाजी ने छापर-द्रोणपुर का इलाका मोहिलों (चौहानों की एक शाखा) से जीता था, किन्तु मोहिल सरदार वरसल ने दिल्ली के सुल्तान की सहायता प्राप्त कर फिर अपने इलाके पर अधिकार कर लिया। तब राव बीकाजी ने अपने भाई बीदाजी की सहायता के लिए गए और मोहिलों से युद्ध कर और उन्हें हराकर छापर-द्रोणपुर का इलाका वापस अपने भाई बीदाजी को सौंप दिया। इस सहायता के एवज में बीदाजी ने राव बीकाजी की अधीनता स्वीकार कर ली। फलस्वरूप बीदाजी के वंशज बीकानेर रियासत के सामंत हैं और यह बीदावत कहलाते हैं तथा इनकी उपाधि ‘ठाकुर’ हैं। बीकानेर रियासत में बीदावत राठौड़ों के ठिकानों में से बीदासर का ठिकाना मुख्य या पाटवी माना जाता है।

बीदाजी की उपाधि ‘राव’ थी। बीदाजी ने कई युद्धों में वीरता दिखलाई थी। राव जोधा के उत्तराधिकारी सांतल की मृत्यु हो जाने पर सांतल जी का छोटा भाई सूजा जी जोधपुर के स्वामी हुए। राव जोधा ने राव बीकाजी को सांतल और सूजा की अपेक्षा ज्येष्ठ होने के कारण पूजनीय चीजें बीकानेर भेजने का वचन दिया था। परन्तु उससे पहले ही राव जोधा की मृत्यु हो गई थी। तब सूजा के गद्दी पर बैठते ही राव बीकाजी ने पूजनीय चीजें बीकानेर भिजवाने के लिए कहलवाया, परंतु सूजा ने इस पर ध्यान नहीं दिया। तब अपनी सेना को साथ ले जाकर राव बीकाजी ने जोधपुर को घेर लिया। इस घेरे में राव बीदाजी भी अपने तीन हजार सैनिकों के जमीयत-सहित साथ थे।

बीदाजी ने अपने जीवनकाल में ही छापर-द्रोणपुर के दो भाग कर अपने एक पुत्र उदयकर्ण को द्रोणपुर और अपने दूसरे पुत्र संसारचन्द्र को पड़िहारा बांट दिया। उदयकर्ण के पुत्र कल्याणदास और राव लूणकर्ण के बीच विरोध हो गया था, जिसकी वजह से द्रोणपुर से कल्याणदास का अधिकार उठ गया और बीदाजी के सारे भूमि-भाग पर संसारचन्द्र के पुत्र सांगा का एकाधिकार हो गया था।

सांगा का पुत्र गोपालदास हुआ था, जिसने महाराजा रायसिंह के विरुद्ध आचरण करने वाले व्यक्तियों में से सारण भरथा को महाराजा सूरसिंह की आज्ञा से मारकर स्वामीभक्ति का परिचय दिया था।

गोपालदास के तीन पुत्र थे – जसवंतसिंह, तेजसिंह और केशवदास थे। ठाकुर गोपालदास ने अपने अंतिम समय में अपने ठिकाने के तीन भाग करके जसवंतसिंह को द्रोणपुर तथा तेजसिंह को चाहड़वास तथा केशवदासजी को बीदासर ठिकाना देकर पाटवी बनाया, क्योंकि केशवदासजी ने एक युद्ध में अपने पिताजी गोपालदासजी के प्राण बचाए थे। केशवदासजी के बाद गोविन्ददास, मानसिंह, धनराजसिंह, कुशलसिंह, केसरीसिंह, जालिमसिंह, उम्मेदसिंह और रामसिंह क्रमशः बीदासर के सरदार हुए।

ठाकुर रामसिंह नि:संतान थे, इसलिए ठाकुर उम्मेदसिंह के छोटे पुत्र अजीतसिंह का वंशधर शिवनाथसिंह उनके गोद गया। महाराजा रत्नसिंह के समय में लाहौर में सिक्खों के साथ अंग्रेजों की लड़ाई के समय बीदासर की जमीयत ने भी राजकीय सेना में सम्मिलित होकर अच्छी सेवाएं की, इसलिए युद्ध की समाप्ति पर बीकानेर महाराजा साहब ने बीदासर के मंत्री को कड़ा-जोड़ी और सिरोपाव देकर सम्मानित किया। भालतव्यापी सिपाही-विद्रोह के समय अंग्रेजी सरकार की सहायतार्थ जब स्वयं महाराजा सरदारसिंह बीकानेर की सेना के साथ रवाना हुए , तब उस समय भी बीदासर के ठाकुर शिवनाथसिंह ने अपनी जमीयत भेजी थी। ठाकुर शिवनाथसिंह के उत्तराधिकारी उनके पुत्र बहादुरसिंह हुए। रेख के संबंध में बहादुरसिंह बीकानेर राज्य की आज्ञा के विरुद्ध आचरण किया जिसकी वजह से इन्हें बीदासर से पृथक करके पांच साल के लिए इन्हें देवली की छावनी में भेज दिया गया और बीदासर पर इनके पुत्र हुकमसिंह को नियत किया गया। ठाकुर हुकमसिंह के बाद उनके पुत्र हीरसिंहजी बीदासर के स्वामी हुए, हीरसिंहजी नि: संतान थे जिसकी वजह से उन्होंने अपने छोटे भाई खुमानसिंह के पुत्र प्रतापसिंह को गोद ले लिया। बीदासर ठाकुर प्रतापसिंह जी ने उच्च शिक्षा मेयो कॉलेज, अजमेर से प्राप्त की थी। बीकानेर महाराजा सर गंगा सिंहजी बहादुर ने अपनी स्वर्ण जयंती के अवसर पर ठाकुर प्रतापसिंहजी को स्थायी रूप से ‘राजा’ की पदवी देकर उन्हें सम्मानित किया था।

ठाकुर प्रतापसिंह जी के बाद इनके पुत्र इन्द्रजीतसिंह बीदासर के स्वामी हुए और इन्द्रजीतसिंह जी के बाद इनके पुत्र किशनराजसिंह जी बीदासर ठिकाने के स्वामी हुए, अभी वर्तमान में बीदासर के स्वामी किशनराजसिंह जी है।

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