क्या संदेश देती हैं चौराहे पर लगी घोड़ों की मूर्ति | Jai Rajputana

ये संदेश देती हैं चौराहे पर लगी घोड़ों की मूर्ति

युद्ध भूमि के समय जिस तरह से हमारे देश में राजा महाराजा मैदान पर लड़ाई करने के लिए उतरते थे उस समय अपने सैनिकों के प्रति जैसी भूमिका एक राजा के होती थी वैसी ही भूमिका राज के रक्षक बने घोड़े की होती थी। घोड़े अपने मालिक की रक्षा पूरी जबाबदारी से करते हुए वीर गति को प्राप्त हो जाते थे।
यही वजह है कि राजा-महाराजाओं की आज भी जब प्रतिमा बनती है तो उनके साथ घोड़ों को भी बनाया जाता है ताकि हमेशा अपने राजा के साथ उसे भी याद किया जाए। घोड़े की मूर्ति प्रतिमाओं के साथ खड़ी हुई उनके रक्षक और वीरता का संदेश पहुंचाती हैं।

दो पैरों पर अगर घोड़ा खड़ा है तो

अगर किसी भी वीर प्रतिमा के साथ खड़े घोड़े के दो पैर अगर ऊपर की तरफ होते हैं तो वह यह संदेश देते हैं कि इस वीर पुरुष या वीरांगना ने अपने जीवन में कई युद्ध लड़े हैं और दोनों की एक साथ मौत हो गई है।
जैसे रानी लक्ष्मीबाई के घोड़े के दोनों पैर स्टेच्यू में ऊपर होते है।

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घोड़े का एक पैर बांया उठा हुआ है तो

किसी भी घोड़े पर सवार महापुरूष के घोडे़ का बांया पैर उठा हो तो समझ लेना चाहिए कि युद्ध में उसके राजा से पहले घोड़ा शहीद हुआ था।
जैसे महाराणा प्रताप जी के घोड़े का बांया पैर सदैव स्टेच्यू में उठा होता है और यह भी संदेश देता है कि युद्ध में योद्धा बहुत जख्मी हो गया था और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई या फिर युद्ध में मिले जख्म की वजह से उसकी मौत भी यह कारण हो सकती है।

घोड़े का एक पैर बांया उठा हुआ है तो

जब स्टेच्यू में घोड़े पर सवार महापुरूष के घोड़े का दांया पैर उठा हो तो समझ लेना चाहिए कि घोडे पर सवार राजा पहले शहीद हुआ है, बाद में उसका घोड़ा।

घोड़ा चारो पैरों पर सामान्य रूप से है तो

कई प्रतिमाओं में आपने ऐसे घोड़े देखे होंगे जो अपने चारों पैरों पर खड़े होते हैं। चारों पैरों पर खडा हुआ घोड़ा यह संकेत देता है कि उस वीर पुरुष ने अपने जीवन में कई युद्ध लड़े हैं लेकिन उनकी मृत्यु सामान्य रूप से हुई है। उस योद्धा की मौत ना तो किसी जंग या युद्ध के दौरान किसी जख्म की वजह से नहीं हुई है। इस वीर योद्धा की मौत सामान्य रूप से हुई है।

जय भिवानी, जय राजपुताना

लेखक:- राजेन्द्र सिंह राठौड़ बालवा

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